1857 में हरियाणा के कई गांवों जैसे लिबासपुर, मुरथल, कुंडली, क्हामपुर, अलीपुर, हमीदपुर, सराय, झाडसा, गुडगांव तथा नगरों जैसे रेवाड़ी, भिवानी, हासी, झज्जर बल्लभगढ, फ़रू ख में सशस्त्र क्रांति हुई थी।
रेवाड़ी के शासक राव तुला राम तथा उनके चचेरे भाई वीर शिरोमणी राव कृष्णगोपाल, झज्जर के नवाब अब्दुर्रहमान खां तथा उनके ससुर, मेवात के सरदार अलीहसन खां, रू दम खां, बल्लभगढ़ के राजा नाहरसिंह, फ़र्रुख नगर के नवाब फ़ौजदार खां आदि ने क्रांति का नेतृत्व किया। पर अंत में विफ़लता हाथ लगी।
राव गोपाल कृ ष्ण तथा समद खां नसीपुर के युद्ध में भारत की आजादी के लिए लड़ते-लड़ते शहीद हुए। इनके अलावाबल्लभगढ़ के राजा नाहरसिंह के सम्बंधी और भाड़सा परगना के ज़ागीरदार बख्तावर सिंह को भी ब्रितानियों ने फ़ांसी दे दी।
हिसार
दिनांक 12 मई, 1857 को नित्य की तरह हिसार के डाकघर से प्राप्त होने वाले काली थैलियाँ नहीं आई। जिलाधीश एवं ब्रितानी गंभीर चिंताग्रस्त हो गए। उस माह की तेरह तारीख़ को मेरठ के बलवे तथा दिल्ली के फ़साद का विस्तृत विवरण पता लगा। ज़िलाधीश ने तुरंत बंदोबस्त किया और ख़ज़ाने को किलें के भीतर भेज दिया। उसने स्वयं भी अपना बंगला को ख़ाली किया और अपनी पत्नी एवं बच्चों के साथ किले के भीतर शरण ली। हरियाणा जिला के रंगहर जाति के सिपाहियों को खजाने और किले की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया। हरियाणा सैन्य अफसर लेफ्टिनेण्ट मरडेल और दौरानदेरी के अजैतन ने एक बँगले में रहना प्रारम्भ किया। अस्सी सिपाहियों को बुलाया गया। पूर्व में किए गए समझौते के अनुसार रईस दादरी नवाब बहादूर जंगखान की ओर से सौ घोड़ों की एक रिसाला, जिलाधीश के सहायक के रूप में रहने लगी। वह बाग़ में रही। इस रिसाला के रिसालादार शेख नूरुद्दीन के माध्यम से बीस और अश्वारोही उक्त रिसाले में भर्ती किए गए। जहाँ कहीं भी आवश्यकता समझी गई वहाँ तहसील, न्यायालय, नगर आदि में रक्षकभटों को अच्छी तरह से तैनात किया गया। पन्द्रह दिनों के पश्चात् एक अफ़वाह उड़ी कि शहज़ादा शेरदिल, जो एक सरकारी नौकर था और जिसे लाड़वाणी में सहायक अनुज्ञा अधिकारी के पद पर नियुक्त किया गया था, ने विद्रोह करने के लिए अपनी कमर कस ली है। वह स्वयं एक उच्चाधिकारी बन गया था। और सुरक्षा की दृष्टि से पचास अतिरिक्त घोड़ों को कथित नवाब के पास से मँगवाया गया। इसके अतिरिक्त जिलाधीश ने और घोड़ों एवं पदाति सैनिकों को भर्ती किया। 90 घोड़ों और सैनिकों का नियमन करने के बाद उसने उन्हें किले के बाहर तैनात कर दिया। एक अफ़वाह फैली कि 25 मई को ईद-उल-फितर के दिन अशांति होगी। उक्त दिवस दिन और रात किले के फाटक बन्द रखे गए और अनेक प्रकार से सुरक्षा की व्यवस्था की गई। वह दिन किसी भी प्रकार की अशांति नहीं हुई और न ही सेना ने विद्रोह किया, परन्तु नक्षत्रों के प्रभाव के कारण कौम-ए-दोगर तथा कौम-ए-माली में तकरार हो गई। परस्पर झड़प के बाद वह विवाद भी समाप्त हो गया।
उस वर्ष सेना में मई 29 के दिन अशांति फैली। दिन के द्वितीय पहर की घंटी बज ही रही थी कि दादरी मार्ग से हाँसी से कुछ घुड़सवार आते हुए दिखलाई पड़े। हिसार के दिल्ली फाटक तक पहुँचने के बाद उन लोगों ने नगर का फाटक खुलवाया। जिलाधीश द्वारा नियुक्त 50 अश्वारोही सैनिक, जो दादरी से आए हुए थे इस फाटक की रक्षा के लिए वहाँ उपस्थित थे। उनमें से कुछ लोगों ने इनका साथ दिया और नगर के फाटक को खोल दिया और उन्हें भीतर बुला लिया। वे उनके साथ मिल गए और पुराने कारागार पर पहुँचकर, वहाँ तैनात सिपाहियों को अपने साथ मिला लिया। कारागार को खोलकर उन्होंने पुराने एवं नए कैदियों को मुक्त किया। सभी प्रकार के लोग, विशेषकर, दुष्ट प्रकृति के लोग भी छोड़ दिए गए। उनमें से कुछ दुष्ट इस सेना के साथ मिल गए और नए कारागार पहुँच गए। वहाँ एक कारखाना था जिसमें लगभग पचास कारीगर कैद थे। उन सभी को रिहा कर दिया गया। कुछ सामग्री, जिन पर इन लोगों का मन आ गया था वे उठा ले गए, शेष बन्दियों ने मिलकर लूटमारी की। नगर में एक और परिवर्तन आने लगा। वे ही घुड़सवार एवं सैनिक जिनको सुरक्षा का भार सौंपा गया था एक हो गए और सिमट एवं होफ्री साहेब के बंगले की ओर चल पड़े। उन्होंने इन दोनों साहिबों के बच्चों एवं मेमों की हत्या कर दी। परमिट के प्यून एवं कोठी के सुरक्षाकर्मी भी इनसे मिल गए। वहाँ से वे न्यायालय की ओर आए और जिलाधीश की गोली मारकर हत्या कर दी। होफ्री साहेब किरानी भी मारा गया। सीमट साहेब गश्तीदल के घुड़साल में छिपकर अपनी जान बचाने में सफल हो गए। वह उस समय गोलियों से बच गया और अपने को सुरक्षित बचा पाया। उसकी सम्पत्ति लूटी गई और उसके बँगले को जला दिया गया। फिर वही घुड़सवार जिलाधीश की कोठी की ओर बढ़े। हरियाणा पलटन के सोलह सिपाही उन से जा मिले। उन्होंने खजाने को अपने कब्जे में ले लिया। दफ्तरखाने की सम्पत्ति लूटी और लुटवाई गई। फिर जिलाधीश के आवासीय बँगले की सम्पत्ति को लूटने के पश्चात् उन्होंने उस बँगले को नष्ट कर दिया। जिलाधीश का परिवार तथा उसके बच्चे बचकर भाग निकले। उसके बाद शेष सिपाही और घुड़सवार भी इन बदमाशों और लुटेरों से आ मिले। मात्र अजितन साहेब व उसकी स्त्री किले में मारे गए और शेष पाँच साहेब वहाँ से भागकर, बच गए। तहसीलदार, थॉमस साहेब भी मारा गया। न्यायालय व तहसील को लूटा गया। बँगलों को अग्नि से जला दिया गया। नगरवासियों ने सरकारी बँगलों के छत में काम आनेवाली लकड़ी की बल्लियाँ तक उखाड़ ली और अपने घर ले गए।
उसी रात हरियाणा पलटन की कम्पनी कुछ घुड़सवारों के साथ वहाँ पहुँची। खजाने को ढ़ोकर वे हाँसी के मार्ग से दिल्ली के लिए कूच कर गए। इसके दूसरे दिन हिसार में अत्यधिक उपद्रव हुआ। कोई अपनी ही खुमारी में मस्त हुआ कहने लगा कि शहंशाह की नियाबत उसे प्राप्त थी। ये दो सेना की कम्पनियाँ जिन्हें धनागार पर नियुक्त किया गया था ने खजाने को ऊँठ-गाड़ियों में लादकर हिसार नामक इस स्थल पर आ पहुँचे। उपायुक्त शहबाज़ बेग तथा कोषाधीश (खजाँची) ने छिपकर अपनी जान बचाई। ये दोनों सैन्य कम्पनियाँ खजाने के साथ दिल्ली गईं। अहमद शाह दुर्रानी के पुत्र, शहज़ादा अज़ीम, जिसे सरकार ने गश्तीदल का सहायक परमिट बनाया था, को सम्पूर्ण विद्रोही सेना का अधिपति बनाया गया। परमिट में लगभग 500 चपरासी सिपाही थे। उन्होंने इस तथाकथित शहज़ादे को दिल्ली के सुल्तान की ओर से हरियाण जिले का सूबेदार अपनी ओर से घोषित कर दिया। तत्पश्चात् उन्होंने इस शहज़ादे से कचहरी-ए-तहसील में सूबेदारी का दरबार लगाने का अनुरोध किया। उन्होंने मनमाना आदेश दिया। अपना शासन बहाल करने के बाद उक्त शहज़ादा चपरासियों की भीड़ के साथ दिल्ली की ओर रवाना हुआ। परन्तु दिल्ली में वह इस प्रकार की लड़ाइयों में फँसा कि कभी हिसार लौटकर न आ पाया। सरकार ने अपने बंदोबस्त किए। एक नया आयुक्त अथवा जिलाधीश हिसार में आया। जिस किसी के प्रति भी आरोप सिद्ध हुआ, उन सभी को दण्डित किया गया और उसने हिसार में अपनी व्यवस्था तंत्र को पूर्णतया स्थापित कर लिया।
सिरसा
उस वर्ष 1857 की 29 मई के दिन सिरसा के नगर और छावनी में यह अफवाह छा गई कि जिला के लगभग 400 घृणित एवं दुष्ट ग्रामवासी फतेहबाद में एकत्रित हुए थे। साहिब-ए-ब्रितानी ने तुरन्त अपनी मेमों एवं बच्चों को पटियाला के राजा के संरक्षण में आनेवाली साहुवाला नामक जगह भेज दिया। साहिबाँ अपने आप से विचार-विमर्श करने लगे। हिसार से प्राप्त चिट्ठियों के माध्यम से वहाँ हुए उपद्रव का समाचार उन्हें अच्छी प्रकार ज्ञात था। सिरसा के साहिबाँ सिरसा से खिसक लेने के अतिरिक्त कुछ और नहीं कर सकते थे। पाँच-सात लोग भला क्या कर लेते? रात में सिरसा के असहाय साहिबाँ भाग निकले। हरियाणा पलटन व चपरासियों की कम्पनी ने खजाने को अपने वश में किया और उसे लेकर दिल्ली चले गए। उन्होंने सिरसा नगर को जी भरकर लूटा। जब जान बचाकर साहिबाँ-ए-ब्रितानी मौज़ा बहरैच नामक जगह पहुँचे तो वहाँ के ग्रामीणों को भी ग़डबड़ी करने की सूझी। थानेदार बच्चू सिंह वफादार रहे और उन्होंने सभी को बचा लिया और उपद्रव को नष्ट कर दिया। उस दिन पटियाला के राजा के सैनिक सहायतार्थ वहाँ पहुँचे। वे उन्हें मौज़ा दूधल ले गए। महाराज के उद्यानवन में उनका डेरा लगाया गया और महाराज की ओर से खूब आवभगत की गई और जश्न मनाया गया। वे वहाँ पन्द्रह दिनों तक रहे। महिलाओं एवं बच्चों को कसाउली भेज देने के बाद साहिबाँ-ए-अंग्रेज 30 जून को पुन: सिरसा लौट आए, और उस भाग पर अपना पूर्ण अधिकार स्थापित कर लिया।
हाँसी
दिल्ली में उपद्रव होने के समय हाँसी में दो रेजिमेण्ट उपस्थित थी। 15 जून को सरकारी सेना में चौथा रिसाला आ मिला। उसके बाद उस प्रान्त के आस-पास के अराजकी तत्त्व वहाँ एकत्रित हुए। पूरी सेना विद्रोह पर उतर आई। कुछ घुड़सवार दिल्ली से आए और रोहतक के खजाने को दिल्ली ले गए। पुन: 29 जून के दिन यहाँ हिंसा एवं उपद्रव भड़के। परमिट के सभी चपरासी सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। हरियाणा पलटन ने भी विद्रोह कर दिया। महिलाओं और बच्चों को हिसार भेज दिया गया और अत्यन्त कठिनाई से साहिब लोग अपनी जान बचाकर भाग निकले। वे राजग़ढ नामक एक स्थान पर पहुँचे जो बीकानेर के राजा की परिधि में आता था। बीकानेर के राजा की ओर से उनका खूब स्वागत-सत्कार किया गया और खूब दावतें की गई। वे वहाँ शांति से कई दिन रुके। तत्पश्चात् हिसार आदि में प्रशासन की पुन: व्यवस्था स्थापित होने के समय ये साहिब लोग भी अपनी जगह लौट गए। इसके बाद यहाँ फिर कोई उपद्रव नहीं हुआ।
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